Narrow-Line Seyfert 1 (NLS1): Farthest Gamma-Ray Emitting Galaxy

Recently, astronomers have discovered the farthest gamma-ray emitting the Narrow-Line Seyfert 1 Galaxy. Astronomers have discovered a new active galaxy identified as the farthest gamma-ray emitting galaxy that has so far been stumbled upon. This active galaxy called the Narrow-Line Seyfert 1 (NLS1) galaxy, which is about 31 billion light-years away, opens up avenues to explore more such gamma-ray emitting galaxies that wait to meet us.

Ever since 1929, when Edwin Hubble discovered that the Universe is expanding, it has been known that most other galaxies are moving away from us. Light from these galaxies is shifted to longer (and this means redder) wavelengths – in other words, it is red-shifted. Scientists have been trying to trace such red-shifted galaxies to understand the early Universe.

What is Gamma-Ray Emitting NLS-1 Galaxy?

  • A new active galaxy (galaxy) has been detected by astronomers. It has been identified as a distant gamma-ray emitting galaxy. This active galaxy is called the Nero line Seifert-1 (NLS-1) galaxy. It is located approximately 31 billion light-years away.
  • In fact, scientists from the Aryabhatta Observational Science Research Institute (ARIES), an autonomous institute of the Department of Science and Technology, have studied about 25,000 luminous active galactic nuclei -AGNs in collaboration with researchers from other institutes such as the Sloan Digital Sky Survey (Sloan) Digital Sky Survey -SDSS) and found that a strange celestial body emits high-energy gamma rays at high redshift.
  • Scientists have identified it as a gamma-ray emitting NLS-1 galaxy. It is rare in space.
  • Significantly, the Sloan Digital Sky Survey -SDSS is a major optical and spectroscopic survey that has been used for the past 20 years to view celestial bodies.
  • Scientists used the world’s largest ground telescope, the US-based ‘8.2 m Subaru Telescope’ (8.2 m Subaru Telescope), for this research. This helped in the new method of detecting NLS-1 of high redshift. Earlier these galaxies were not known.
  • This discovery will pave the way for the detection of gamma-ray emitting NLS-1 galaxies in the universe.

What is Red Shift? 

  • Discovered in 1929 by Admin Hebbal that the universe was expanding. Since then it has been known that most galaxies are falling away from us.
  • The light from these galaxies shifts to longer wavelengths. This is called redshift.
  • Scientists are understanding this redshift of galaxies so that the universe can be understood.

What is a Galaxy?

  • The Galaxy is a system of billions of stars, clouds and gases. In other words, the open sky consists of a bright broad white stripe galaxy-spanning from one side to the other, consisting of a cluster of millions of stars.
  • The galaxy in which our solar system is present is named ‘Milky Way. It was conceived in ancient India by a flowing river of light in the sky. That’s why the galaxy is called the ‘galaxy’ in India. The Milky Way has a spiral shape.
  • Like the Milky Way, millions of galaxies from the universe. Therefore, it is very difficult to imagine the vastness of the universe. The search for this continues unabated.

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नेरो लाइन सीफर्ट-1 (एनएलएस-1) गैलेक्सी
(Narrow-Line Seyfert 1 (NLS1))

हाल ही में खगोल वैज्ञानिकों ने सबसे दूर स्थित गामा किरण उत्सर्जक Narrow-Line Seyfert 1 गैलेक्सी की खोज की है। खगोल वैज्ञानिकों ने एक नई सक्रिय आकाशगंगा का पता लगाया है। इसकी पहचान सुदूर गामा रे उत्सर्जक आकाशगंगा के रूप में की गई है। इस सक्रिय आकाशगंगा को नेरो लाइन सीफर्ट-1 (एनएलएस-1) गैलेक्सी कहा जाता है। यह लगभग 31 बिलियन प्रकाश वर्ग पीछे है। इस खोज से आगे की खोज का मार्ग प्रशस्त होता है।

1929 में एडमिन हब्बल ने खोज की थी कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। तब से यह ज्ञात है कि अधिकतर आकाशगंगा हमसे दूर हो रही हैं। इन आकाशगंगाओं से प्रकाश लम्बे रेडियो तरंग की ओर मुड़ जाते हैं। इसे रेड शिफ्ट कहा जाता है। वैज्ञानिक आकाशगंगाओं के इस मोड़ की खोज कर रहे हैं ताकि ब्रह्मांड को समझा जा सके।

क्या है गामा किरण उत्सर्जक एनएलएस-1 गैलेक्सी? 

  • खगोल वैज्ञानिकों ने एक नई सक्रिय आकाशगंगा (गैलेक्सी) का पता लगाया है। इसकी पहचान सुदूर गामा रे उत्सर्जक आकाशगंगा के रूप में की गई है। इस सक्रिय आकाशगंगा को नेरो लाइन सीफर्ट-1 (एनएलएस-1) गैलेक्सी कहा जाता है। यह लगभग 31 बिलियन प्रकाश वर्ष दूर स्थित है।
  • दरअसल विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एआरआईईएस) के वैज्ञानिकों ने अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं के सहयोग से लगभग 25,000 चमकीले सक्रिय ग्लैक्टिक न्यूकली का अध्ययन स्लोन डिजिटल स्काई सर्वे से किया और पाया कि एक विचित्र खगोलीय पिंड उच्च रेडशिफ्ट पर उच्च ऊर्जा गामा किरण का उत्सर्जन कर रहा है।
  • वैज्ञानिकों ने इसकी पहचान गामा किरण उत्सर्जक एनएलएस-1 गैलेक्सी के रूप में की है। यह अंतरिक्ष में दुर्लभ है।
  • गौरतलब है कि स्लोन डिजिटल स्काई सर्वे एक प्रमुख ऑप्टिकल तथा स्पेक्ट्रोस्कोपिक सर्वे है जिसका इस्तेमाल पिछले 20 वर्षों से खगोलीय पिंडों को देखने के लिए किया जा रहा है।
  • इस शोध के लिए वैज्ञानिकों ने विश्व का सबसे बड़ा जमीनी टेलीस्कोप अमेरिका के हवाई स्थित ‘8.2एम सुबारू टेलीस्कोप’ का इस्तेमाल किया। इसने उच्च रेड शिफ्ट की एनएलएस-1 का पता लगाने की नई पद्धति में मदद की। इससे पहले इन आकाशगंगाओं की जानकारी नहीं थी।
  • इस खोज से ब्रह्मांड में गामा रे उत्सर्जक एनएलएस-1 आकाशगंगाओं के पता लगाने का मार्ग प्रशस्त होगा।

क्या है रेड शिफ्ट?

  • 1929 में एडमिन हब्बल ने खोज की थी कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। तब से यह ज्ञात है कि अधिकतर आकाशगंगा हमसे दूर हो रही हैं।
  • इन आकाशगंगाओं से प्रकाश लांगर तरंगो की ओर शिफ्ट हो जाता है। इसे रेड शिफ्ट कहा जाता है।
  • वैज्ञानिक आकाशगंगाओं के इस रेड शिफ्ट को समझ रहे हैं ताकि ब्रह्मांड को समझा जा सके।

क्या है आकाशगंगा? 

  • आकाशगंगा करोड़ों तारों, बादलों तथा गैसों की एक प्रणाली है। दूसरे शब्दों में, खुले आकाश में एक ओर से दूसरे ओर एक फैली चमकदार चौड़ी सफेद पट्टी आकाशगंगा होती है, जो लाखों तारों के समूह से मिलकर बनी होती है।
  • हमारा सौरमण्डल जिस आकाशगंगा में उपस्थित है, उसका नाम ‘मिल्क वे’  है। प्राचीन भारत में इसकी कल्पना आकाश में प्रकाश की एक बहती नदी से की गयी थी। इसीलिए गैलेक्सी को भारत में ‘आकाशगंगा’ कहा जाता है। मिल्की वे  का आकार सर्पिलाकार (स्पाइरल) है।
  • मिल्की वे की तरह लाखों आकाशागंगाएँ मिलकर ब्रह्मांड का निर्माण करती हैं। अतः ब्रह्मांड की विशालता की कल्पना करना अत्यधिक कठिन है। इसके बारे में खोज निरंतर जारी है।

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